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Thursday, September 26, 2013

भारतीय सैलानियों को लुभाने का मिशन यूएसए

Golden Gate Bridge
अमेरिका के समन्वित टूरिज़्म-मार्केटिंग संगठन ब्रांड यूएसए ने अपना दूसरा इंडिया ट्रैवल मिशन पूरा किया। इसका आयोजन 22 से 26 सितंबर, 2013 को नई दिल्ली और मुंबई में किया गया था। मिशन में 47 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया जो अमेरिका में विभिन्न पर्यटन मंजिलों, आकर्षक स्थलों, होटलों और पर्यटन ठिकानों की प्रबंधन कंपनियों के 31 संगठनों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।

इस ट्रैवल मिशन ने मुंबई में 23 सितंबर और नई दिल्ली में 25 सितंबर को दो इंटरेक्टिव सेशन आयोजित किए। इससे अमेरिकी प्रतिनिधियों को भारतीय पक्षों के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाने का मौका मिला। इसमें आमंत्रित मेहमानों में भारत के ट्रैवल कारोबार से जुड़े लोगों के अलावा विमान सेवाओं के प्रतिनिधि, होटल उद्योग के प्रतिनिधि व टूर ऑपरेटर शामिल थे। इसके अलावा, नई दिल्ली में 26 सितंबर को ट्रैवल मीडिया के लिए अलग से संवाद की व्यवस्था की गई थी जिसमें ट्रैवल ट्रेड और कंज्यूमर मीडिया से जुड़े पत्रकारों ने हिस्सा लिया।

पिछले कुछ सालों में भारत से अमेरिका जाने वाले यात्रियों की संख्या में बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। अमेरिकी वाणिज्य विभाग द्वारा हाल में जारी आंकड़ों के मुताबिक, सैलानियों को अमेरिका भेजने वाले 20 अव्वल देशों में भारत का 12वां स्थान है, कुल 724,433 यात्री अमेरिका पहुंचे जो पिछले साल के मुकाबले 9.2 फीसदी वृद्धि है। साल 2012 में, पैसे खर्च करने के मामले में भारतीय सैलानियों का स्थान 10वां रहा और उन्होंने कुल 4.9 अरब डॉलर खर्च किए यानी पिछले साल के मुकाबले 11 फीसदी अधिक।

Hawaii Islands
मिशन को मिली जबर्दस्ती कामयाबी के मद्देनज़र, ब्रांड यूएसए के वाइस प्रेसीडेंट, ग्लोबल पार्टनरशिप डेवलपमेंट, जे ग्रे ने कहा कि हम ट्रैवल उद्योग में अपने सहयोगियों से मिले जबर्दस्त सहयोग के लिए उनके आभारी हैं। इस प्रकार के आयोजन अमेरिका को पर्यटन मंजिल के तौर पर प्रचारित करने में अहम् भूमिका निभाते हैं और हम इनके माध्यम से ज्यादा से ज्यादा भारतीय यात्रियों को हमारे देश में उनके लिए उपलब्ध असीमित अवसरों के बारे में बताते हैं।

ब्रांड यूएसए द्वारा हाल में मार्केटिंग प्रतिनिधि नियुक्त की गई कंपनी सार्था ग्लोबल की प्रबंध निदेषक शीमा वोहरा ने कहा, ’’ट्रैवल मिशन अमेरिकी सप्लायरों द्वारा अपने ट्रैवल भागीदारों को पर्यटन मंजिलों के बारे में जानकारी मुहैया कराने वाला उपयुक्त और लाभकारी मंच है जो उन्हें परस्पर फायदेमंद व्यावसायिक सौदों को साकार करने में मदद करता है।‘‘

ब्रांड यूएसए में 7 एम टूर्स एलएलसी, बेवेरली हिल्स कॉन्फ्रेंस एंड विजि़टर्स ब्यूरो, कैलीफोर्निया एकेडमी ऑफ साइंसेज़, सीज़र्स एंटरटेनमेंट, च्वॉयस होटल्स इंटरनेशनल, डिज़्नी पार्क्स यूएसए, फेयरमॉन्ट रैफल्स होटल्स इंटरनेशनल, लास वेगस कन्वेंशन एंड विजि़टर्स अथॉरिटी, मैकीज़, एनवाइसी एंड कंपनी, मैडम तुसाद्स न्यूयार्क, एम्पायर स्टेट बिल्डिंग ऑब्ज़रवेटरी, न्यूयार्क वॉटर टैक्सी, ब्रॉडवे कलेक्शन, पैपिलॉन ग्रैंड केन्यॅन हेलीकॉप्टर्स, फिलाडेल्फिया कन्वेंशन एंड विजि़टर्स ब्यूरो, सैन फ्रांसिस्को ट्रैवल एसोसिएशन, सैन्स इंक्रेडिबल वैकेशंस, सी वर्ल्ड पार्क्स एंड एंटरटेनमेंट, सिमॉन शॉपिंग डेस्टिनेशंस, स्टारवुड एशिया पैसिफिक होटल्स एंड रेसोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड, सनडेन हेलिकॉप्टर्स, टूर अमेरिका इंक., टूर्स लिमिटेड, ट्रैवल ओरेगन, यूनीवर्सल ओरलैंडो रेसोर्ट्स, विजि़ट कैलीफोर्निया, विजि़ट फ्लोरिडा, विजि़ट ऑरलैंडो और विजि़ट टंबा बे के प्रतिनिधि शामिल थे।

Friday, July 19, 2013

रोमांच के लिए फिलीपींस



Chocolate Hills of Phillipines
दक्षिण-पूर्व एशिया के जिन देशों के बारे में हम सबसे कम जानते हैं, उनमें फिलीपींस भी है। हमें इस बात का अंदाजा कम ही होगा कि फिलीपींस इस इलाके में सबसे खूबसूरत देशों में से है

शानदार भौगोलिक विविधता वाले फिलीपींस के पास एशिया में सबसे लंबी कोस्टलाइन यानी समुद्र तट है। फिलीपींस की सबसे खूबसूरत बीच लोकेशंस में बोराके द्वीप, पलावान और कैमिग्यूइन द्वीप शामिल हैं। खास तौर पर बोराके तो शानदार सफेद पाउडर जैसी रेत और चांदी से चमकते साफ गरम पानी के लिए प्रसिद्ध है। लोग यहां कई दिनों तक सुकून में पसरे रह सकते हैं। फिलीपींस में कई चीजों का मजा लिया जा सकता है। जैसे:

लोबोक रिवर क्रूज जो मोटरबोट में लोबोक नदी के उद्गम लोआए पुल से शुरू होता है और ताड़ के पेड़ों से घिरी पानी की धारा से होते हुए टोनटोनान वाटरफॉल्स के पास जाकर खत्म होता है। यहां कई सारे झरने पानी में गिरते हैं। आप उनमें भीगने का मजा भी ले सकते हैं। लेकिन क्रूज पर नाव में स्थानीय लोगों द्वारा जो दावत दी जाती है, वह यादगार है।

फिलीपींस के बोहोल प्रांत में चॉकलेट हिल्स (पहाड़ियां) यहां के सबसे लोकप्रिय व जाने-माने सैलानी स्थलों में से एक हैं। चॉकलेट हिल्स दरअसल 1268 एक सरीखी गुमटीनुमा पहाड़ियों का एक समूह है। सारी पहाड़ियां लगभग तीस मीटर ऊंची हैं। अगल-बगल में लगभग बराबर दूरी पर फैली ये चट्टान कृतियां दरअसल पृथ्वी के लाखों सालों के विकासक्रम का नतीजा हैं।

रोमांच प्रेमियों के लिए फिलीपींस में बहुत कुछ है। जैसे कि डाइविंग। अनीलाओ, प्यूर्तो गैलेरा और बोराके लोकप्रिय डाइविंग स्थलोंमें गिने जाते हैं। इसके अलावा पलावान में तुब्बाताहा रीफ और कोरोन में भी खूबसूरत डाइविंग स्पॉट हैं। इसके अलावा फिलीपींस में माउंटेनियरिंग, कैनोपी वॉकिंग, केविंग, राफ्टिंग व सर्फिंग का भी मजा लिया जा सकता है। ज्यादा दुस्साहस करना हो तो डनाओ एडवेंचर पार्कलैंड में दो सी मीटर की ऊंचाई से छलांग लगाकर तीन सौ मीटर चौड़ी खाई में झूलने का मजा भी यहां लिया जा सकता है। इसी तरह प्यूर्तो प्रिंसेसा में अंडरग्राउंड नदी की खोज में निकल सकते हैं।

फिलीपींस में शॉपिंग भी अन्य कई दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों की तुलना में सस्ती है। मजेदार बात यह है कि फिलीपींस में भी आप छोटी दुकानों पर भारत की ही तरह बोली गई कीमत के 50 फीसदी तक मोलभाव कर सकते हैं। क्वीजोन सिटी में एसएम सिटी नॉर्थ ईडीएसए शॉपिंग मॉल, बे सिटी में एसएम मॉल ऑफ एशिया, सान जुआन सिटी में ग्रीनहिल्स शॉपिंग सेंटर और मकाती सिटी में अयाला सेंटर शॉपिंग के प्रमुख अड्डों में से हैं।

Saturday, June 8, 2013

जय बर्फानी बाबा


अपनी विलक्षणता, पौराणिकता और कष्टसाध्यता के कारण अमरनाथ यात्रा को भारत की सबसे महत्वपूर्ण तीर्थयात्राओं में माना जाता है। तीर्थाटन में इसकी महत्ता कैलास यात्रा और चारधाम यात्रा के समकक्ष ही है। मुश्किल रास्ते और प्रतिकूल मौसम के बावजूद यहां जाने वाले लोगों की संख्या में साल-दर-साल हो रहा इजाफा इस बात का गवाह है


Amarnath Cave
 कश्मीर की खूबसूरत लिद्दर घाटी के सुदूर किनारे पर एक संकरी खाई में बसे हैं बाबा अमरनाथ। गुफा में बर्फ के लिंग के रूप में स्थित महादेव शिव का यह स्थान समुद्र तल से 3888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। बर्फ का यह शिवलिंग पूरी तरह प्राकृतिक है और कहा जाता है कि चंद्रमा के घटने-बढ़ने के साथ ही यह शिवलिंग भी घटता-बढ़ता है। मुख्य लिंग के अगल-बगल ही बर्फ के दो और शिवलिंग हैं जो देवी पार्वती और गणेश के प्रतीक हैं। इस गुफा के धार्मिक-पौराणिक इतिहास के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं।

साल के ज्यादातर समय यह जगह बर्फ से घिरी रहती है और लिहाजा यहां पहुंचना लगभग नामुमकिन सा होता है। गर्मियों में बर्फ के पिघलने के बाद यहां जाने का रास्ता खुलता है। हर साल ज्येष्ठ-श्रावण के महीनों में यहां यात्रा होती है। हर साल यात्रा की अवधि भी कम ज्यादा होती रहती है। यात्रा की अवधि, इंतजामों और यात्रियों की मौत को लेकर पिछले कई सालों से यात्रा चर्चा में रही है। वैष्णो देवी की ही तरह अमरनाथ के लिए भी अलग से श्राइन बोर्ड बना हुआ है जो यात्रा के सारे इंतजाम देखता है। इस साल यात्रा 28 जून से शुरू होगी और कुल 55 दिन तक चलेगी। रक्षाबंधन के दिन 21 अगस्त को छड़ी मुबारक के अमरनाथ पहुंचते ही यात्रा संपन्न हो जाएगी। पिछले कुछ सालों में यात्रियों की मौत का मसला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद इस बार किसी भी व्यक्ति का हेल्थ सर्टीफिकेट के बगैर यात्रा के लिए रजिस्ट्रेशन नहीं किया जाएगा। यात्रा के लिए हर व्यक्ति को रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है और इस साल के लिए रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया 18 मार्च से पहले ही शुरू हो चुकी है। रजिस्ट्रेशन की एक तय प्रक्रिया है। साथ ही हर रूट पर किसी भी दिन जाने वाले यात्रियों की भी एक तय संख्या है। रजिस्ट्रेशन का जिम्मा देशभर में कई बैंकों के पास है और उनके पास हर रूट व हर तारीख का एक कोटा है। इसके अलावा इस साल यह भी तय किया गया है कि 13 वर्ष से कम और 75 वर्ष से ज्यादा उम्र के किसी भी व्यक्ति को इस साल यात्रा पर जाने की इजाजत नहीं होगी। इसी तरह छह हफ्ते या उससे ज्यादा के गर्भ वाली किसी महिला को भी यात्रा पर नहीं जाने दिया जाएगा।

कैसे जाएं


Traditional route to Amarnath caves goes through Pahalgam and Chandanwari
 अमरनाथ यात्रा जाने के दो रास्ते हैं- पहला, पहलगाम से होकर और दूसरा सोनमर्ग से होकर। दोनों ही रास्तों के लिए पहले ट्रेन, बस अथवा हवाई जहाज से जम्मू या श्रीनगर पहुंचना होता है। उसके बाद आप पहलगाम या सोनमर्ग जा सकते हैं। उसके बाद अमरनाथ गुफा तक का आगे का सफर पैदल, खच्चर पर या पालकी में किया जा सकता है। पहलगाम का रास्ता बेस कैंप चंदनवाड़ी, पिस्सू टॉप, शेषनाग व पंजतरणी होते हुए गुफा तक पहुंचता है। जबकि सोनमर्ग का रास्ता बालटाल से सीधा गुफा तक ले जाता है। पहलगाम वाले रास्ते में आने-जाने में पांच दिन का वक्त लग जाता है। वहीं बालटाल से गुफा तक एक दिन में पहुंचा जा सकता है। 14 किलोमीटर का यह रास्ता खड़ी चढ़ाई वाला है। फिट लोग इस रास्ते पर बालटाल से जल्दी चढ़ाई शुरू करके उसी दिन दर्शन करके नीचे लौट आते हैं। इस रास्ते पर बालटाल और पहलगाम वाले रास्ते पर चंदनवाड़ी से आगे किसी भी व्यक्ति को यात्रा परमिट और स्वास्थ्य प्रमाणपत्र के बगैर जाने की इजाजत नहीं है। वहीं यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर की सुविधा भी है। यात्रा के दौरान बालटाल और पहलगाम, दोनों ही जगहों से पंजतरणी तक होलीकॉप्टर की उड़ानें उपलब्ध रहेंगी। बालटाल से पंजतरणी तक का इकतरफा किराया 1500 रुपये और पहलगाम से पंजतरणी तक का इकतरफा किराया 2400 रुपये तय किया गया है। हेलीकॉप्टर के टिकट के लिए ऑनलाइन बुकिंग कराई जा सकती है। जो हेलीकॉप्टर से अमरनाथ जाना चाहते हैं, उन्हें अलग से रजिस्ट्रेशन कराके यात्रा परमिट भी लेने की जरूरत नहीं है। हेलीकॉप्टर का टिकट उसके लिए पर्याप्त है।

पहलगाम और सोनमर्ग, दोनों ही स्थानों पर रुकने के लिए कई होटल व रिजॉर्ट हैं। वहीं, आगे यात्रा मार्ग पर यात्रियों के लिए कैंप व खाने-पीने के पर्याप्त इंतजाम होते हैं। मणिगाम, बालताल व पंजतरणी में डेढ़ सौ से लेकर पांच सौ रुपये तक में रुकने की सुविधा मिल जाती है। यात्रा के दौरान खच्चरों व पालकियों के रेट भी तय हैं। आपको बस मौसम व थकावट से जूझने के लिए उत्साह, जीवट, शारीरिक क्षमता और जरूरी कपड़े-दवाइयां चाहिए होते हैं।

Saturday, June 1, 2013

ये वादियां मेरा दामन

कश्मीर में श्रीनगर, गुलमर्ग, सोनमर्ग व पहलगाम से आगे भी बहुत कुछ है। दरअसल कश्मीर में आप जिस ओर निकल जाएं, खूबसूरत वादियां पसरी पड़ी हैं, सब एक से बढ़कर एक। इनमें से बहुत कम से ही हम वाकिफ हैं। इस बार कश्मीर जाएं तो ऐसी ही किसी नई वादी में जाएं, जो अब तक देखी न हो। इन्हीं में से एक यूसमर्ग की सैर इस बार।



Yousmarg is in no way less than Sonmarg or Pahalgam
 कश्मीर के लोग एक बड़ी मजेदार बात कहते हैं। कहने को श्रीनगर पहाड़ है और जम्मू मैदान, लेकिन जम्मू शहर पहाड़ी पर बसा है और जम्मू से सड़क के रास्ते श्रीनगर आएं तो पूरा रास्ता पहाड़ी है। जैसे ही काजीगुंड के बाद श्रीनगर की ओर बढ़ते हैं तो सत्तर किलोमीटर का आगे का पूरा रास्ता सपाट है, मानो आप मैदान में सरपट रेस लगा रहे हों। यही हाल श्रीनगर से आप कहीं भी जाएं तो मिलेगा। श्रीनगर से पहलगाम तक मैदान ही मैदान है। गुलमर्ग के रास्ते में तनमर्ग तक सपाट मैदान है।


Beautiful slopes of Yousmarg with pine forests all around
 कश्मीर की खूबसूरती ही इतनी ऊंचाई पर फैली इतनी शानदार सपाट घाटी से है। उसके बाद इस घाटी में जहां-जहां नदियों के साथ-साथ रास्ते पहाड़ से मिलते हैं, वहां का नजारा बदल जाता है। इसके अलावा पहाडि़यों की ऊंचाइयां नापने के बाद फिर वैसी ही लंबी दूर तक फैली घाटियां और मैदान देखना, बेहद सुखद है। गुलमर्ग व सोनमर्ग का नजारा कुछ ऐसा ही है- इतनी ऊंचाई पर देवदार की घनी कतारों के बीच खुला मैदान, हमारे उत्तराखंड के बुग्यालों से कई गुना बड़े। लेकिन कश्मीर में यह खूबसूरती केवल गुलमर्ग व सोनमर्ग तक ही नहीं सिमटी है। वहां लोग ज्यादा गए, इसलिए उन्हें शोहरत ज्यादा मिल गई। लेकिन जगहें और भी हैं।

यूसमर्ग ऐसी ही एक बेइंतहा खूबसूरत जगह है। गुलमर्ग की बाईं तरफ की पहाडि़यों में बडगाम जिले में स्थित यूसमर्ग श्रीनगर से 47 किलोमीटर दूर है। श्रीनगर से इसका रास्ता बडगाम व चरारे शरीफ होकर जाता है। चरारे शरीफ दरगाह में कश्मीर के सूफी संत हजरत शेख नूर-उद-दीन नूरानी की मजार है। यहां से यूसमर्ग महज 13 किलोमीटर दूर है। श्रीनगर से इस सफर में दो घंटे का वक्त लगता है। यह रास्ता भी कम खूबसूरत नहीं। यूसमर्ग में दूर तक फैला हरा मैदान है। उसके पीछे चीड़ के घने जंगल और उनके पीछे से झांकती बर्फ से लदी चोटियां। यहां का नजारा मंत्रमुग्ध कर देने वाला है।

Doodh Ganga flowing just a few hundred metres from Yousmarg
कश्मीर की बाकी जगहों की ही तरह यहां की भी यही खासियत है कि आप चाहें तो यहां कई दिन केवल सुकून में बिता सकते हैं और चाहें तो करने को इतना कुछ है कि कई दिन की जरूरत पड़े। यूसमर्ग के आसपास कई जगहें देखी जा सकती हैं। वहां ट्रैक करके भी जाया जा सकता है और खच्चर पर सवारी करके भी। यूसमर्ग से सबसे निकट दूधगंगा है। लगभग दो किलोमीटर की यह दूरी आसानी से ट्रैक करके पूरी की जा सकती है। जगह का नाम दूधगंगा पहाड़ से आती नदी में चट्टानों से टकराने के बाद दूध सरीखे झाग बनने की वजह से पड़ा। नदी का यह किनारा बहुत खूबसूरत है। नदी की धार के साथ आगे चले जाएं तो नीचे नदी नीलनाग नामक झील में पहुंचती है। यह झील पहाड़ी की गोद में है और अपने नीले साफ पानी की वजह से नीलनाग कहलाई जाती है। हालांकि यहां खच्चर से जाने का रास्ता और सड़क से जाने का रास्ता अलग है। दूधगंगा में पानी संग सफेद नामक चोटी से आ रहा है। पास ही में टट्टा कुट्टी नामक एक और चोटी भी है। यूसमर्ग से संग सफेद के लिए दो दिन का ट्रैक भी किया जा सकता है। इसके अलावा यूसमर्ग से फ्रेसनाग, हालीजान, बरगाह, लिद्दर मड व त्रिसूर भी जाया जा सकता है। यूसमर्ग से ठीक पहले पहाडि़यों से आने वाला पानी रोककर एक बंध बना दिया गया है जिससे वहां एक खूबसूरत जलाशय बन गया है।


Reservoir close to Yousmarg
 चूंकि यूसमर्ग श्रीनगर से महज दो ही घंटे के रास्ते पर है, इसलिए सैलानी श्रीनगर से यहां सवेरे आकर शाम को लौट भी सकते हैं और चाहें तो यहीं रुक भी सकते हैं। यकीनन, अगर आसपास की जगहें देखनी हों तो यहां रुकना ही सही होगा। और यह जगह है भी ऐसी कि यहां आकर लौटने का मन जल्द करेगा नहीं। हालांकि यूसमर्ग में अभी सोनमर्ग व गुलमर्ग जैसी होटलों और रिजॉर्ट की भरमार नहीं है लेकिन वहां रुकने की सुविधाएं हैं। जम्मू-कश्मीर टूरिज्म और जेकेडीटीसी के भी रेस्ट हाउस हैं। वह दिन दूर नहीं जब यहां भी सैलानी उमड़ने लगेंगे।

Tuesday, May 14, 2013

आओ कुछ तूफानी करते हैं

नई पीढ़ी जोखिम लेने से नहीं डरती। यह आंख बंद करके छलांग लगाने वाली नहीं बल्कि खुली आंखों से छलांग लगाने वाली पीढ़ी है- चाहे छलांग हवा में लगानी हो या पानी के तेज धार में। यही कारण है कि आज एडवेंचर टूरिज्म युवाओं के बीच पहले से कहीं ज्यादा लोकप्रिय है। बस एक मौका और कुछ तूफानी करने की इच्छा जोर मारने लगती है


It used to be highest village in world not so long ago
दोपहर बाद का वक्त था। कुछ समय पहले तक दुनिया के सबसे ऊंचे गांव की हैसियत रखने वाले किब्बर से मैं अपनी मोटरसाइकिल पर काजा लौट रहा था। कुछ समय पहले तक इसलिए कि अब यह दर्जा किब्बर से कुछ ही किलोमीटर दूर कोमिक गांव को मिल चुका है। दोनों ही स्पीति घाटी के दुर्गम इलाके में हैं। किब्बर की ऊंचाई 4200 मीटर है और कोमिक की 4275 मीटर। सबसे ऊंचे गांव का पैमाना यही है कि जहां तक किसी वाहन से पहुंचा जा सके। पहले किब्बर तक सड़क थी, तो किब्बर सबसे ऊंचा था, उसके बाद कोमिक तक सड़क पहुंची तो कोमिक ऊपर हो गया। रिहाइश वाले गांव कोमिक से ऊपर भी जरूर होंगे, बस वहां तक सड़क पहुंचना बाकी है। इस सारी बहस से परे, मेरे लिए बाइक से वहां पहुंचने का रोमांच बेहद ज्यादा था। इस ख्याल से भी ज्यादा कि एवरेस्ट की लगभग आधी ऊंचाई पर इतने मुश्किल मौसम में क्योंकर कोई अपनी जिंदगी गुजार देता होगा।


Way to Kinnaur valley is just amazing

बहरहाल, किब्बर से लौटते हुए ढलान में पथरीले मोड़ पर मेरी बाइक ने थोड़ा सा संतुलन खोया और फिसल पड़ी। मैं धराशायी हो गया। दो दिन में ठीक इसी तरह से मैं दूसरी बार गिरा था। काजा से पहले ढंकर गोम्पा से नीचे उतरते हुए भी यही हुआ था। उस समय तो बाइक पर पीछे दोनों तरफ सामान लदा था, इसलिए गिरने का सारा असर उस सामान ने झेल लिया था। लेकिन किब्बर से लौटते हुए बचाने को सामान न था। इसलिए थोड़ा असर शरीर ने और बाकी बाइक ने झेला। संभला और उठ खड़ा हुआ। मैं मोड़ पर पहाड़ की तरफ गिरा था। दूसरी तरफ सैकड़ों फुट नीचे घाटी में स्पीति नदी बह रही थी। बाईं ओर दूर घाटी में काजा दिखाई दे रहा था और सामने दाईं ओर लोसर होते हुए कुंजम टॉप जाने का रास्ता। ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं जहां तक नजर जाती थी, किसी इंसान का नामों-निशान तक न था। एकबारगी डर लगा कि कहीं कुछ हो जाए तो दूर-दूर तक कोई मदद करने वाला नहीं। लेकिन कपड़ों की मिट्टी की ही तरह मैंने डर को भी झाड़ा और निकल पड़ा। एडवेंचर का शायद यही सिला है।

न तो रास्ता अनोखा था और न मेरा सफर, लेकिन था बेहद रोमांचकारी। इसीलिए दुनियाभर से हर साल कई धुन के पक्के बाइकर्स इसी रोमांच को अपने भीतर उतारने के लिए लाहौल या स्पीति घाटियों की सैर पर निकल पड़ते हैं। मंजिल या तो लेह होती है या फिर काजा। एडवेंचर बाइकिंग के शौकीनों के लिए यह मक्का के समान हैं। मेरे लिए भी था। मेरी ही तरह कई सिरफिरे ऐसे भी होते हैं जो अकेले निकल पड़ते हैं। तिसपर मैं तो सीजन की शुरुआत में ही निकल पड़ा था, जब न तो रास्ते खुले थे, न होटल। मौसम भी खुशगवार होना शुरू न हुआ था। यही कारण था कि मैं कोमिक जाने की हिम्मत न जुटा पाया क्योंकि लांगजा से आगे का रास्ता बर्फ की पतली चादर से ढका था जिसपर बाइक चलाना मुश्किल था। कुंजम टॉप का रास्ता भी लोसर के आगे खुला न था। अकेले दुस्साहस करने का जोखिम मैंने मोल न लिया।


Spiti valley has altogether different terrain

कुंजम ला (दर्रा) लाहौल व स्पीति घाटियों को जोड़ता है। जो बाइकर्स स्पीति की तरफ जाना चाहते हैं, वे शिमला से आगे नारकंडा, रामपुर-बुशहर होते हुए किन्नौर घाटी में पहुंचते हैं और फिर वहां से पूह, नाको व ताबो होते हुए स्पीति के मुख्य शहर काजा में पहुंचते हैं। इस इलाके को ठंडा रेगिस्तान भी कहा जाता है। जो लोग लाहौल घाटी में जाना चाहते हैं वे मनाली से रोहतांग व कीलोंग होते हुए लाहौल घाटी में प्रवेश करते हैं और दुनिया के कई सबसे ऊंचे वाहनयोग्य दर्रों (16 हजार फुट की ऊंचाई से भी ज्यादा) को पार करके लद्दाख इलाके में पहुंचते हैं। रोहतांग व कीलोंग के बीच ग्रम्फू नाम की जगह है जहां से एक रास्ता कुंजम ला के लिए निकलता है। जो बाइकर्स काजा जाते हैं और उसी रास्ते वापसी नहीं करना चाहते, वे काजा से लोसर होते हुए कुंजम ला पार करके ग्रम्फू के रास्ते रोहतांग व मनाली आ जाते हैं। वहां से वे दिल्ली या चंडीगढ़ निकल जाते हैं। उसी तरह लेह जाने वाले उसी रास्ते वापसी न करने के लिए लेह से कारगिल के रास्ते श्रीनगर निकल जाते हैं और वहां से जम्मू होते हुए वापसी करते हैं। जिनके पास ज्यादा वक्त जेब में हो और एक ही ट्रिप में लौहाल व स्पीति, दोनों घाटियां नापने की फिराक में हों, वे काजा से आगे कुंजम ला पार करने के बाद ग्रम्फू से बजाय मनाली की तरफ आने के कीलोंग की तरफ होते हुए लेह निकल जाते हैं। दोनों ही रास्ते दुर्गम व दुष्कर हैं। दोनों घाटियों को एक सफर में पार करना बेहद कष्टसाध्य है और इसे एडवेंचर (सिरफिरेपन) की इंतिहा भी कहा जा सकता है।

इस एडवेंचर में थोड़ा जोखिम है, बहुत मेहनत है लेकिन उतना ही सुख व सुकून है। इतने कष्ट के बाद प्रकृति का जो नजारा आंखों के सामने आता है, वह कल्पनातीत है। कुछ फोटो देखकर उसे महसूस नहीं किया जा सकता। इसीलिए जिन्हें मौका मिलता है, वे इसका अहसास वहां जाकर जरूर करते हैं। चाहे वे बाइक से जाएं या चौपहिया से या फिर बस में ही। कई साहसी स्कूटर से भी ये रास्ते नाप लेते हैं। लाहौल-स्पीति के इलाके को बर्फीला रेगिस्तान कहा जाता है। इतनी ऊंचाई पर, इतने दुर्गम इलाके में क्यों व कैसे इंसान बसते हैं और किस तरह सदियों से वहां की विशिष्ट संस्कृति को बचाए हुए हैं, यह जानना-समझना भी उतना ही रोमांचक है।


Biking in Himalayas is fun
 दरअसल रोमांच की तलाश भी विचित्र है, जाने कहां-कहां खोजा जाता है उसे। बस अपनी नजर का सवाल है। लाहौल के रास्ते खोखसर में पागल नाला या स्पीति के रास्ते में नाको से आगे मलिंग नाला के बर्फीले पानी को पार करने का अपना रोमांच है। लेकिन कच्छ के रण में दलदली मिट्टी में बाइक चलाना क्या कम रोमांचक होगा, जहां के रेगिस्तान की विशालता इतनी भव्य है कि आप उसमें अपनी गति व रास्ता, सबकुछ खो सकते हैं? औऱ क्या जैसलमेर में दोनों तरफ रेतीले टीलों के बीच बाइक सरपट दौड़ाना कम खूबसूरत होगा? खूबसूरत रास्तों की बात ही कर रहे हैं तो हाल ही में एक सर्वे में मुन्नार से ऊटी के रास्ते को बाइकिंग के लिए दुनिया का सबसे खूबसूरत रास्ता माना गया था। चाय के बागानों से लदी पहाड़ियों के बीच से होकर गुजरना कितना रोमांचक रहा होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन उसकी बातें फिर कभी।

(आउटलुक हिंदी के पर्यटन विशेषांक- मार्च-अप्रैल 2013, में प्रकाशित)

 
 

Thursday, May 2, 2013

A treacherous night at 13K fts


Recent death of a Bengali tourist due to cold near Rohtang Pass in Himachal Pradesh, when struck in an unusually heavy snowfall brought to my mind a chilling reminder of that day… or perhaps night when me and my partner could have met the same fate and almost at same place and in similar… or may be tougher conditions. It was by large distance, the toughest night of my life and but for those three kind souls, could have been the last one. 5th July 2005 was intended to be one of the most significant dates in my adventure life, and it indeed proved to be albeit in starkly different context. It also proved, like in this case too, that weather can be too deceptive; it could topsy-turvy all plans and put your entire carefully planned itinerary into waste bin. It could be a cruel joke sometimes.

Being a trekker and biker, biking all the way to Ladakh was akin to visit to Mecca, ditto for all adventure bikers. An earlier wish to go around the world on a bicycle been nipped in the bud; dream to biking to Ladakh was well nurtured. In Bhasha, I had an able life partner to support and sustain my adventure escapades. With some support and encouragement, we went ahead.  Months were spent in meticulous planning and preparations. I didn’t have a Bullet (that time, now I am a proud owner), that usually bikers on that way normally prefer, but then I had numerous examples of lighter bikes and even scooters going through the treacherous mountain route quite successfully. A brief online search took me to Pardesi Automobiles in Karol Bagh. I got my three year old (Hero Honda) Ambition refurbished enough to withstand the hardship; accumulated all the accessories, including a double sided luggage carrier (of a kind usually used on a bullet, but I got it designed for my bike) and an on-road repair kit. Special care was taken as Bhasha was to ride pillion all the way along and back, since all my earlier attempts to give her some biking lessons had fallen flat. Besides, neither we had any dry run nor I had rode so long (or for that matter even half of it) ever before. But I was more than assured of my homework and some thorough feedback from one of my friends Gagan Sethi who, though younger than me is a veteran of that particular route.

But then I was later to have a face-off with the fact that copy-book, Google based homework don’t always work that well. Well, the flag-off was uneventful, so was the ride till Chandigarh, where we had a lunch stopover at Gagan Sethi’s home. First day target was to reach Bilaspur in Himachal Pradesh. But it was quite late when we reached there. I had my first experience of riding in the hills and that too in the dark. It was first day of a unique (for me) riding expedition. We had covered more than three hundred kilometers that day, another first for me. Besides some anxious moments on turns while negotiating with glaring headlights of trucks, we reached Bilaspur safely. But then, riding in the dark was something that we were not prepared well for, something I missed in my homework.

Anyway, PWD rest house was our home for that night at Bilaspur. An over-spacious room, nice weather and a caring chowkidar greeted us. After a delicious dinner we were off to bed in no time. Second day was planned to have a lesser travel to keep ourselves fitter for ascend to the Lahaul valley. In a bright morning we left for Manali at a distance of just over 180 kilometres. It was a beautiful route via Mandi, Sundernagar, Pandoh along the Beas river. We had started enjoying the ride by then. We had planned our stay at Youth Hostel at Khakhnal village, just nine kilometers before Manali on the opposite side of the river. Though, now YHAI has given its hostel franchisee to a hotel in Prini village. It was a nice and peaceful place surrounded by apple orchards overlooking river. We had covered the first leg of our journey. Real ride was just about to start. Bike hasn’t given any problem till then, except for snapping of speedometer cable putting my distance calculations into disarray.

Once in Manali, weather suddenly started to take bad turn. Although it is normal to have heavy monsoon rains in that part of India during first week of July, but my homework had told me that Lahaul valley was supposedly a cold desert and once we cross over the Rohtang Pass into Lahaul there is hardly any rains. Despite probability of heavy rains, this ‘well-known fact kept me encouraging as Rohtang was just about fifty kilometers from Manali. We kept ourselves in good spirits.

Rain didn’t wait for next day. As soon as we were back to the hostel after dinner at a nearby restaurant, it started raining. Whole night I could hear the thunder and the fall breaking the silence of the valley. I would be lying if I say that I was not worried. I was keeping my fingers crossed for the next day. It was a gloomy morning with rains everywhere and no visible signs of letting up. But then I was again boosting both of us for only a push till Rohtang in the hope that everything will be in control after that. We were targeting to reach Khoksar, less than 25 kilometres downhill from Rohtang to be safe and on the track. We had full specially designed raingears for us. I was quite confident of them to keeps us dry till we reach Khoksar. I never knew that I was awaiting a huge shock. We had barely crossed Manali and started to ascend when we realized that our specially designed, rain-proof, rough & tough gears were not able to withstand the heavy downpour. We had already started feeling wet inside and windy & cold conditions were sending chill down the spine.

Not the best of sights for a biker
We decided to get some extra protection and purchased a couple of raincoats for both of us. Over-clothed, we moved ahead. Rain was getting heavier and I was finding it tough to ride. Despite gloves, hands were freezing because of water seeping inside. Roads had become slippery making it tough to ride. Every layer of protection had in fact given away to rain. I was worried that even our luggage & clothes were getting wet. It was just the start of a long journey and all clothes gone wet would have been terrible. But we still kept moving with two things in mind- first there was not much a choice left and secondly, hope of getting things better as we move on top. Past Kothi and Gulaba we somehow reached Marhi. Rains had relented a bit. We were feeling wet and hungry, desperately needing a rest. Ordered some aloo-paranthas and while waiting for them utilized time by drying the outermost layer of clothes in the heat of the tandoor. We started feeling a bit relieved after getting some warmth from within and outside.

Ride from Marhi to Rohtang Jot is a tricky one, with many glaciers on the way. It was 1 in the afternoon by the time we reached Rohtang top- tired and drenched upto the hilt. Still there were many tourists having fun in few remaining short patches of snow. Tourist vehicles were lined up on both sides of the road on the top. I looked out for a food shop where I can park my bike and unpack some of the luggage to ascertain the damage caused by rain. We were lucky to find Lucky Fast food. Weather was still quite overcast, but we were feeling relaxed. Leisurely, we tried to dry some of our clothes, specially socks and shoes. Plateful of hot maggi and tea were just like a new lease of life for both of us. But as if it was not enough for us, it started raining again. It was just about 3 in the afternoon. My mathematical calculations were working overtime. Gateway to Lahaul valley, Khoksar was another 25 kilometres from there. Though reaching Keylong would have been better, but I was ready to bargain for Khoksar, where we could have found a descent place to stay. We were already too late for Keylong.  Khoksar was downhill from Rohtang and as per my estimates it should not take more than 45 minutes to reach there from Rohtang Jot. It was also safe to ride until it gets too dark. I thought this option to be wiser than returning to Manali. Going by this calculation, we decided to wait for rain to stop.

Fatal combination of rain, snow and winds
But, as the destiny would have transpired, rain was unrelenting. In fact it went on becoming heavier and heavier. Sensing weather, tourists started rushing back to Manali. I was perhaps the only biker there. As I sheepishly and foolishly waited for that elusive 45 minutes window, the Rohtang top very quickly became a deserted place. Two hours passed in no time. By 5, I started getting really very worried. But, rain had become so heavy that there was no way I could have ride. Soon, raindrops turned into hails. It was getting freezing cold. Now I could sense where I had put us into. Heavy weather quickly took away all the daylight. All tourists and most of the vendors had already gone down. My immediate worry was what happens if our vendor also decides to pack up. It was our shelter since noon. Now both of us started getting terribly worried. We talked to the hotel guys, they were three of them. To our big relief, they said that they will be staying there for the night.

Although spending night there was still the last thought in our minds, but that reality was looming large on us. It appeared to us that actually there was nobody on the Rohtang top besides five of us, or at least I couldn’t trace anybody else. Everybody else had gone down. With last daylight fading away, the rainfall gave way to mild snowfall. Now there was practically no way for us to go, either up or down. We resigned ourselves to fact that we will have to spend the night on Rohtang pass amidst heavy rains and snowfall in a shelter which we were not sure, would be able to survive the night; in a company of three hotel vendors, about whom we knew nothing. But then we had left ourselves with no other choice, then to have faith in them.

He cooked some delicious maggi for us
Vendors had no hesitation in allowing us to stay there for night despite knowing it very well that there shop had very little space. They were also aware that there was no other option. Hence, for next twelve hours, we were entirely at their mercy. First few hours were spent in talking and knowing more about them and their families. They all were from Mandi in Himachal. This was their summer vocation. In winters they used to move back to their homes. Unlike other vendors, they use to stay at Rohtang almost for whole summer, but for some occasional trips down to Manali to get goods or some emergencies. They all seemed very soft and gentle to us. You will rarely find such guys in our ‘cultured’ metros.
Maggi was again the choice for the dinner. Once it was over, nothing else was left to be done except for getting into warmth of a blanket. The shop had a partition. Main part was the kitchen and the shop and on the other side of the partition was the makeshift sleeping place of the vendors. We were not carrying any bedrolls with us as we expected to get night shelters evrywhere. But the three vendors were generous enough to not only give us their blankets and mattresses but also arranged for us to sleep in the inside drier and warmer part of the shelter. For themselves they arranged in the main part of the shop. No words can probably justify our gratitude for them. After so many years, even today just this thought sends a chill down the spine that what would have happened to us were they not there.

Bike needed a shelter too
There was no movement at the pass, except for some occasional vehicle crossing. I parked my bike inside the shop to prevent it from burying under the snow till morning. But for our daily needs, there was no other way then to go out in open carrying an umbrella to save from rain and snow. It was snowing whole night and being a high altitude pass, wind was quite sharp and chilling. And actually it was frightening at the most times. Vendors must be accustomed to it, but for us it was indeed a bone-chilling experience. The noise of wind against the plastic sheet being used as roof was terrible. Every now and then we felt that wind will blow away this only shed we have on our heads. And sheer thought of such a happening was unnerving. Quite expectedly we couldn’t sleep whole night. Although terrible headache, high altitude dizziness, fears of unknown, cold and fatigue kept us down and pinned to our beds. It was a very long night.

Snow-snow everywhere
As every night gives way to a new dawn, those terrible hours passed away. Morning was bright. But it was all white. Obviously there was heavy snowfall in the night. Inches of fresh snow was carpeted all over.  Still, weather and nightmarish twelve hours failed to dampen our spirits. We decided to move ahead. After some hot tea and breakfast, we were back on our two wheels. Only then we realized that riding a bike on fresh snow was tougher than expected. We somehow managed to reach the Rohtang top, which was another kilometer and half from the shops and the fun area of the pass. Peril started, once we crossed the jot on the way to jigs below. It was so white that usually beautiful curvaceous road with many hairpin bends was nowhere to see. Not many vehicles had passed since night so there were even no tyre marks to follow. Bike was skidding every now and then and one of the slips was very severe. We thought there has to be some end to insanity. We finally decided to turn back. The skids and the slips were so scary that Bhasha decided to walk back to safety instead of riding pillion so that I can handle bike more comfortably.  Still we both kept slipping.  Once Bhasha even went into snow waist-deep. We somehow managed to reach back to the Lucky fast food. Had a breathe of relief along with tea.
Samaritans of Lucky fast food

With heavy hearts, we came back to Manali. And you know, what? Just before bridge on Beas to cross to the Manali town, bike slipped again. Luckily we escaped any major casualty. Nine kilometers away, Youth Hostel, Khakhnal still had room for us. It was only when we reached to confines of our room and exposed ourselves to happenings around, then we came to that the rainfall last night was one of the most heavy and unusual downpour for the region. We were wise to have turned back from Rohtang as there was not just heavy snowfall on all the major passes till Leh, but the Pagal nallah just across Khoksar was heavily overflowing. Army had stopped all movements on Manali-Leh highway owing to this weather. It means, even if we would have managed to reach Khoksar, there would have been no way ahead for us. Later on, we came to know that Pagal nallah blocked the highway for almost a week. Even Mandi-Manali highway was breached at many places by the suddenly swollen Beas river. It means roads back to Delhi were also closed, although weather had improved a lot. We waited for two days in Manali. Went to places around and even had another trip to Rohtang, this time minus any luggage and met our samaritans of Lucky fast food. As soon as the roads back to Delhi opened, we were off. Our poor journalism jobs couldn’t afford the luxury of waiting endlessly for Pagal nallah to relent. The dream of riding to Leh still lives with us.

Tuesday, April 30, 2013

सेतुबंध के ये रामेश्वर


राम की कथा से रामेश्वरम का गहरा नाता उसे मिथकों में वही दर्जा दिला देता है जो देश के तमाम पौराणिक शहरों को हासिल है। इसमें कोई शक नहीं कि रामेश्वरम की ज्यादातर महत्ता रामनाथस्वामी मंदिर के लिए है, लेकिन रामेश्वरम की भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक खूबसूरती उसे बाकी लिहाज से भी आकर्षण का केंद्र बनाती है

Greater Flamingos at Rameshwaram
धनुष्कोडी से रामेश्वरम लौटते समय इस नजारे की कल्पना मैंने नहीं की थी। जब रामेश्वरम नजदीक आने लगा और मेरी निगाहें अचानक समुद्र की ओर गईं तो मैं किनारे से थोड़ी ही दूर हजारों की तादाद में फ्लेमिंगो देखकर अचंभित रह गया। दुनिया के इस हिस्से में पाए जाने वाले ग्रेटर फ्लेमिंगो भारत के कई तटीय इलाकों में दिख जाते हैं। चिलिका झील के नलबन द्वीप में मैं फ्लेमिंगो देख चुका था, लेकिन यहां वे काफी नजदीक थे और खासी बड़ी संख्या में भी। रामेश्वरम की इस खासियत के बारे में मुझे नहीं पता था। फ्लेमिंगो देखने के बाद इस यात्रा को लेकर बड़ी सुखद सी अनुभूति हो रही थी। और यह नजारा ठीक समुद्र तट पर स्थित उस कोडंडारामास्वामी मंदिर के बगल में देखने को मिला जो विभीषण के नाम पर बना है। कहा जाता है कि यह मंदिर ठीक उसी जगह पर बना है जहां लंका छोडऩे के बाद विभीषण ने राम से पहली बार मुलाकात की थी। युद्ध समाप्त होने के उपरांत बाद में इसी स्थान पर राम ने लंकाधिपति के तौर पर विभीषण का राज्याभिषेक किया था। धनुष्कोडी में तीन तरफ फैले अथाह समुद्र और चालीस साल पहले समुद्री चक्रवात के बाद पानी के भीतर समा गई एक नगरी के भग्नावशेष देखने के बाद सफेद-गुलाबी फ्लेमिंगो के कई झुंड देखकर बहुत सुकून मिला।
Outer Corridor of the Ramanathswamy Temple
हमारे मिथकीय तीर्थस्थानों में रामेश्वरम सबसे पूजनीयों में से एक है। चूंकि यहां राम ने शिव की आराधना की थी, इसलिए यह उन गिने-चुने स्थानों में से एक है जो शैवों व वैष्णवों, दोनों के लिए समान रूप से श्रद्धा का केंद्र है। इसके अलावा यह देश के चार कोनों में स्थित चार मूल धामों में से एक है। रामनाथस्वामी मंदिर खुद तो सबसे बड़े तीर्थों में से एक है ही, साथ ही वहां भारत के तमाम बाकी तीर्थों में स्नान का भी लाभ मिलता है। रामेश्वरम में दरअसल कई तीर्थ है और मान्यताओं के अनुसार उन सभी में स्नान करने के बाद वस्त्र बदलकर भक्त मंदिर में दर्शन के लिए जाते है। लेकिन स्नान व दर्शन की आस्था से इतर शिल्प के लिहाज से भी यह मंदिर बेहद शानदार है। दक्षिण भारतीय द्रविड़ शैली में बना मंदिर परिसर बेहद भव्य व विशाल है और गर्भगृह तीन वृत्ताकार गलियारों से घिरा है। इनमें से सबसे बाहरी गलियारे को दुनिया का सबसे बड़ा गलियारा कहा जाता है। इसमें 1212 स्तंभ है, जिनपर खूबसूरत चित्रकारी की गई है। सारे स्तंभों की अपनी खास नक्काशी भी है।
मंदिर में दो शिवलिंग स्थापित हैं। कथा यह है कि लंका युद्ध के दौरान जब राम ने शिव की आराधना करनी चाही तो उन्होंने हनुमान से शिवलिंग लाने को कहा। जब हनुमान को देर लगी तो सीता ने राम की पूजा के लिए शिवलिंग बनाया। बाद में जब हनुमान हिमालय से शिवलिंग लेकर लौटे तो राम ने उसकी भी पूजा का आदेश दिया। मान्यता यह है कि हनुमान के लाए विश्वलिंगम की पूजा पहले होती है और सीता के बनाए रामलिंगम की पूजा उसके बाद। माना जाता है कि रामेश्वरम में मुख्य मंदिर और उसके आसपास कुल 64 तीर्थ हैं (जिनमें स्नान करने की परंपरा है)। रामेश्वरम की सारी संरचना रामकथा के इर्द-गिर्द है, इसलिए यहां आपको गंधमादन पर्वत भी मिल जाएगा और राम की चरण-पादुका भी। यहां आपको पंचमुखी हनुमान मंदिर में रखी मूंगे की वो चट्टानें भी दिख जाएंगी जिनका इस्तेमाल पौराणिक कथाओं के अनुसार नल-नील ने समुद्र पर सेतु बनाने के लिए किया था। रामेश्वरम शहर से थोड़ा पहले विलूंदी तीर्थम भी है जहां समुद्र के बीच में मीठे पानी का स्रोत है। कहा जाता है कि राम ने सीता की प्यास बुझाने के लिए यहां समुद्र में अपना बाण डुबोया था।
Viloondi Teertham
लेकिन तमाम मान्यताओं व श्रद्धाओं के बीच हकीकत यह है कि रामेश्वरम बंगाल की खाड़ी में पांबन द्वीप पर स्थित खूबसूरत शहर है। रामेश्वरम व धनुष्कोडी का इलाका मुख्यतया मछुआरों का रहा है। जाहिर है कि यहां की समूची अर्थव्यवस्था दो ही चीजों पर आधारित है- तीर्थाटन और मछली। हालांकि रामेश्वरम को बीच डेस्टिनेशन के तौर पर कभी प्रोमोट नहीं किया गया लेकिन समुद्र से लगा उसका इलाका बेहद खूबसूरत है। जैसे कि विलूंदी तीर्थम को सिर्फ प्राकृतिक खूबसूरती के लिहाज से देखा जाए तो सामने पसरा नीला समुद्र मन मोह लेने वाला है।

धनुष्कोडी
Dhanushkodi: Way to Sangam
रामेश्वरम जाकर धनुष्कोडी का जिक्र न करना नामुमकिन है। धनुष्कोडी का महत्व दो तरीके से है। पांबन द्वीप में धनुष्कोडी के सिरे से ही एडम्स ब्रिज शुरू होता है, जिसे हिंदू मान्यताओं में रामसेतु की संज्ञा दी जाती है। धनुष्कोडी जाकर समुद्र के विस्तार में इसका अंदाज लगा पाना बेहद मुश्किल है। हां, हवा में उड़ते हुए या सैटेलाइट से यकीनन आप उथले समुद्री पानी के नीचे उस रेतीले बंध का अंदाजा लगा सकते हैं जो भूवैज्ञानिकों के अनुसार कभी भारत व श्रीलंका के बीच जमीनी संपर्क हुआ करता था। कुछ लोग रामेश्वरम मंदिर के पुराने रिकॉर्ड के हवाले से कहते हैं कि 1480 में एक जबरदस्त तूफान के आने से पहले तक यह संपर्क कायम था। धनुष्कोडी का दूसरा पहलू ऐसे ही एक तूफान की देन है। 1964 में 22-23 दिसंबर की रात एक भीषण चक्रवाती तूफान के आने से पहले धनुष्कोडी एक जीवंत बंदरगाह शहर था और मदुरै से आने वाली रेल लाइन का आखिरी सिरा। तब रामश्वेरम में केवल मंदिर था और मंदिर पहुंचने के लिए तीर्थयात्रियों को घोड़ागाड़ी करनी होती थी या पैदल जाना होता था। लेकिन उस तूफान ने धनुष्कोडी को उजाड़ दिया और रामेश्वरम को बसा दिया। बताया जाता है कि उस तूफान में धनुष्कोडी के दोनों ओर समुद्र पांच किलोमीटर तक ऊपर चढ़ आया। समुद्र के पानी और रेत के नीचे एक समूचा शहर और सैकड़ों लोग दफन हो गए। धनुष्कोडी में आज भी उस दिल दहलाने देने वाली रात के खंडहरी निशान मौजूद हैं। हर मायने में धनुष्कोडी एक अद्भुत जगह है। धनुष्कोडी से श्रीलंका का मन्नार द्वीप महज 30 ही किलोमीटर दूर है। वहीं रामेश्वरम से धनुष्कोडी की दूरी लगभग 21 किलोमीटर है। इसमें से आठ किलोमीटर तक ही पक्की सड़क है। समुद्र के किनारे पहुंचने पर आगे छह-सात किलोमीटर की धनुष्कोडी गांव की दूरी और और वहां से उतनी ही (बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर के) संगम तक की दूरी समुद्र के किनारे-किनारे (बीच में कहीं समुद्र के भीतर भी) रेतीले बियाबान से पूरी करनी होती। यह सफर रोमांचक है लेकिन कई लोगों के लिए कष्टदायक भी हो सकता है।

पांबन के रास्ते
Train passing through Pamban bridge
रामेश्वरम जाने के कई रास्ते हैं- हवाई जहाज से, ट्रेन ने, बस से और जरूरत पड़े तो नाव से भी। रामेश्वरम के लिए सबसे निकट का हवाई अड्डा मदुरै है। लेकिन वो यहां से लगभग 170 किलोमीटर दूर है। कम चौड़ी सड़क पर दोतरफा यातायात और ट्रैफिक देखते हुए इस रास्ते को तय करने में लगभग चार घंटे का समय लग जाता है। रामेश्वरम के लिए तमिलनाडु के बाकी सभी शहरों से लंबी दूरी की बसें भी हैं। लेकिन रामेश्वरम जाने का सबसे बड़ा रोमांच पांबन के रेल पुल से होकर है। पांबन में रेल व सड़क पुल दोनों हैं। लेकिन जब हम पांबन पुल का नाम लेते हैं तो लोगों के जेहन में पांबन का रेल पुल ही आता है। हम इंजीनियरिंग के कमाल की बात करते रहते हैं, लेकिन हममें से ज्यादातर को यह जानकर हैरत होगी कि कुछ साल पहले बने मुंबई-वर्ली सी लिंक से पहले तक यह देश का सबसे बड़ा समुद्री पुल था। लगभग ढाई किलोमीटर लंबा पुल सौ साल पहले अंग्रेजों के समय बनाया गया था। पुल की खास बात यह है कि यह बीच में से उठ जाता है ताकि बड़ी नावें और जहाज खाड़ी से होते हुए समुद्र में इस पार आ-जा सकें। यह पुल देखना ही अपने आप में रामेश्वरम जाने का एक बड़ा आकर्षण है। इस रास्ते होते हुए मदुरै व अन्य जगहों से रोजाना कई ट्रेनें रामेश्वरम जाती हैं।

कब व कहां
Daiwik Hotels at Rameshwaram
दक्षिण भारत के बाकी तटीय इलाकों की ही तरह रामेश्वरम का तापमान पूरे सालभर लगभग एक जैसा रहता है। मानसून के महीनों में जमकर बारिश होती है। सितंबर से मार्च के महीनों में जाएं तो राहत लगती है क्योंकि उस समय उत्तर भारत में ठंडक रहती है। इसलिए बारिश के दिनों को छोड़कर रामेश्वरम जब निकल जाएं, बेहतर। रामेश्वरम में रुकने के सस्ते व अच्छे विकल्प मौजूद हैं। तीर्थनगरी होने की वजह से छोटी-बड़ी कई धर्मशालाएं भी हैं। बेहतर होटलों के स्तर पर दैविक सरीखे होटल भी हैं जो बने ही सुनियोजित तीर्थाटन की परिकल्पना पर हैं। रामेश्वरम जैसी जगह पर तीर्थ के लिहाज से जाने के लिए यह भी जरूरी है कि आपको सारी जगहों की जानकारी हो। दैविक जैसे होटल एक तीर्थ के अनुकूल माहौल देने के साथ-साथ देखने लायक जगहों के बारे में अपने शोध का भी फायदा भी मेहमानों को पहुंचाते हैं। जैसे बहुत कम लोगों को पता होगा कि रामेश्वरम के निकट भी समुद्र के किनारे विवेकानंद स्मारक है। कहा यह जाता है कि शिकागो की जिस यात्रा ने विवेकानंद को दुनियाभर में लोकप्रिय कर दिया, उस यात्रा का सारा खर्च रामनाड के राजा ने ही उठाया था। शिकागो से वापसी में पानी के जहाज के रास्ते विवेकानंद 26 जनवरी 1897 को पांबन में ही उतरे थे जहां रामनाड के राजा भास्कर सेतु ने खुद उनकी आगवानी की थी। आज वहीं विवेकानंद स्मारक है।
Vivekanand Memorial at the sea coast in Pamban

Sunday, April 28, 2013

इन छुट्टियों के मजे दस और


पिछली बार मैंने गर्मियों की छुट्टियों के लिए दस नए आइडिया पेश किए थे। इस बार फिर पेश हैं दस नई थीम और उनके मुताबिक दस शानदार जगहें। आखिर जब गर्मियों की छुट्टियां लंबी हैं तो हमारे आइडिया क्यों खत्म हो जाएं। हमारे आसपास की प्रकृति के रंग इतने विविध हैं तो भला वे रंग हमारे सैर-सपाटे में भी तो झलकने चाहिए। आइए चले कुछ और यात्राओं पर-

View from Binsar
हिमालय: बिनसर
सफेद चोटियों का यह बेमिसाल नजारा
कुमाऊं के हिमालयी इलाके के सबसे खूबसूरत स्थानों में से एक है बिनसर। नैनीताल से महज 95 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस जगह की ऊंचाई समुद्र तल से 2420 मीटर है। हिमालय का जो नजारा यहां से देखने को मिलता है, वह शायद कुमाऊं में कहीं और से नहीं मिलेगा। सामने फैली वादी और उसके उस पार बाएं से दाएं नजरें घुमाओ तो एक के बाद एक हिमालय की चोटियो को नयनाभिराम, अबाधित दृश्य। चौखंबा से शुरू होकर त्रिशूल, नंदा देवी, नंदा कोट, शिवलिंग और पंचाचूली की पांच चोटियों की अविराम श्रृंखला आपका मन मोह लेती है। और अगर मौसम खुला हो और धूप निकली हो तो आप यहां से बद्रीनाथ, केदारनाथ और गंगोत्री तक को निहार सकते हैं। सवेरे सूरज की पहली किरण से लेकर सूर्यास्त तक इन चोटियों के बदलते रंग आपको इन्हें अपलक निहारने के लिए मजबूर कर देंगे। यहां से मन न भरे तो आप थोड़ा और ऊपर जाकर बिनसर हिल या झंडी धार से अपने नजारे को और विस्तार दे सकते हैं। बिनसर ट्रेकिंग के शौकीनों के लिए भी स्वर्ग है। चीड़ व बुरांश के जंगलों से लदी पहाड़ियों में कई पहाड़ी रास्ते निकलते हैं। जंगल का यह इलाका बिनसर वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के तहत आता है। इस अभयारण्य में कई दुर्लभ जानवर, पक्षी, तितलियां और जंगली फूल देखने को मिल जाते हैं। बिनसर से अल्मोड़ा लगभग तीस किलोमीटर दूर है। यहां से 35 किलोमीटर दूर जागेश्वर के प्रसिद्ध मंदिर हैं। बिनसर के नजदीक गणनाथ मंदिर भी है। यहा खली एस्टेट भी देखा जा सकता है जहां कभी यहां के तत्कालीन राजाओं का महल हुआ करता था।
कैसे जाएं: बिनसर के लिए सबसे नजदीक का रेलवे स्टेशन काठगोदाम है। वहां से अल्मोड़ा के रास्ते या नैनीताल के रास्ते सड़क मार्ग से बिनसर आया जा सकता है। काठगोदाम के लिए दिल्ली व लखनऊ से ट्रेनें हैं। सबसे निकट का हवाई अड्डा पंतनगर है।

Singapore cruise center
क्रूज: सिंगापुर
समुद्र की लहरों पर मौज-मस्ती
टाइटैनिक की कहानी डराती जितना भी हो, समुद्र की यात्रा के लिए आकर्षित भी खूब करती है। समुद्र की सैर का अपना मजा है। खास तौर पर अगर यह सैर पानी के किसी क्रूज जहाज से हो तो क्या बात है। आम तौर पर बड़े क्रूज जहाज अपने आप में किसी शहर जैसे होते हैं। रहने के लिए शानदार कमरे, मनोरंजन के लिए कई थियेटर, क्लब, अलग-अलग खाने के रेस्तरां, बार, कई तरह की गतिविधियां, खेल-कूद, कैसिनो, शॉपिंग मॉल, स्विमिंग पूल- यहां आपको किसी चीज की कमी महसूस नहीं होगी। क्रूज की दुनिया बिलकुल अलग होती है। अंदर की रंगीनियत अलग और बाहर डेक पर जाएं तो दूर-दूर तक समंदर का नीला पानी। तीन-चार दिन के क्रूज में आपको समुद्र में सैर करते-करते कुछ नई जगहों को देखने का बढ़िया मौका भी मिल जाता है। सिंगापुर को दक्षिण एशिया में क्रूज का सबसे बड़ा हब माना जाता है। भारत में इंटरनेशनल क्रूज के लिए इस तरह का कोई पोर्ट नहीं है। हालांकि कोच्चि से बीच-बीच में कुछ क्रूज लाइन अपनी सेवाएं चलाती रही हैं। सिंगापुर का क्रूज सेंटर कमोबेश किसी हवाई अड्डे सरीखा है। उसी तरह का माहौल, उसी तरह की सहूलियतें। सिंगापुर का क्रूज सेंटर हर साल दस लाख क्रूज यात्रियों के आवागमन को हैंडल करता है। यहां से तीस से ज्यादा क्रूज लाइन के जहाजों की सेवाएं हैं। मलेशिया और इंडोनेशिया के शहरों के लिए फेरी सुविधा भी यहां से है।
कैसे जाएं: सिंगापुर पहुंचने के लिए कई साधन हैं। सिंगापुर का चांगी इंटरनेशनल एयरपोर्ट दुनिया के सबसे व्यवस्ततम एयरपोर्ट में से एक है। दुनिया के साठ से ज्यादा देशों के दो सौ से ज्यादा शहरों के लिए सौ से ज्यादा एयरलाइंस की उड़ानें यहां से हैं। भारत के सभी महानगरों से सिंगापुर के लिए रोजाना कई उड़ानें हैं। दिल्ली से सिंगापुर का प्रति व्यक्ति वापसी किराया लगभग 24 हजार रुपये से शुरू हो जाता है। क्रूज के पैकेज का खर्च अलग होगा।

Asiatic Lions st Gir in Gujarat
सफारी: गिर
जंगल के राजा की मांद में
गुजरात में जूनागढ़ व अमरेली जिलों में फैला गिर नेशनल पार्क भारत में एशियाई शेरों का एकमात्र गढ़ है। यहां के अलावा भारत में जंगल में कहीं ओर शेर नहीं पाए जाते। शेर की गिनती उन जानवरों में होती है जो लुप्त होने का खतरा झेल रहे हैं। इस बात की कोशिश काफी समय से हो रही थी कि गिर के शेरों को कहीं ओर भी बसाया जाए ताकि गिर में कोई आफत आए तो उससे सारे शेर खत्म न हो जाएं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने गिर से कुछ शेरों को मध्य प्रदेश में पालपुर कुनो नेशनल पार्क भेजने का फैसला किया है। इससे एशियाई शेरों को भारत में दूसरा घर मिल जाएगा। जब तक यह नहीं होता, शेरों को देखने के लिए भारत में गिर ही एकमात्र जगह है। लगभग ढाई सौ वर्ग किलोमीटर इलाके में फैले गिर नेशनल पार्क में लगभग चार सौ शेर हैं। बाघ और अन्य बड़ी बिल्लियों के उलट शेर इंसान की मौजूदगी से ज्यादा प्रभावित नहीं होते। शेरों के इंसानी बस्तियों के आसपास रहने की भी घटनाएं देखी जाती रही हैं। शेर बाघ की तरह शर्मिला भी नहीं होता, इसलिए किसी टाइगर रिजर्व में जहां बाघ को देख पाना बड़ा मुश्किल होता है, वहीं गिर में शेरों को अच्छी तादाद में बड़ी आसानी से देखा जा सकता है। मार्च से मई तक का समय  शेरों को देखने के लिए बहुत अच्छा होता है क्योंकि तब वे पानी के लिए अक्सर बाहर दिख जाते हैं। गिर में आम तौर पर तीन सफारी होती हैं- सवेरे 6.30 बजे, सवेरे 9 बजे और दोपहर में 3 बजे। लेकिन सवेरे की पहली सफारी शेरों को देखने के लिए सबसे अच्छी मानी जाती है क्योंकि तब शेर सबसे ज्यादा सक्रिय होते हैं। सफारी के लिए वाहनों का परमिट लिया जाना होता है। लेकिन सीजन के समय होटल व सफारी, दोनों की बुकिंग पहले करा सकें तो बेहतर होगा। वरना लंबी कतार झेलनी पड़ सकती है। गिर को लेकर शेरों की बात इतनी हो जाती है कि वहां के पक्षियों की बात ही नहीं हो पाती जबकि जाने-माने पक्षी प्रेमी सालिम अली ने कहा था कि गिर में अगर शेर नहीं होते तो वह देश के सबसे खूबसूरत पक्षी अभयारण्यों में से एक होता।
कैसे जाएं: गिर के सबसे निकट का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा अहमदाबाद का है। गिर यहां से 390 किलोमीटर दूर है। मुंबई से दीव (दमन) हवाई अड्डे के लिए भी उड़ान है। वहां से गिर 112 किलोमीटर है। अहमदाबाद से गिर के सड़क सफर में सात से आठ घंटे का वक्त लग जाता है। गिर के निकट का बड़ा रेलवे स्टेशन  राजकोट है। राजकोट से गिर 164 किलोमीटर दूर है और इस सफर में तीन से चार घंटे का वक्त लग जाता है। इसके अलावा ट्रेन से गिर से 60 किलोमीटर दूर जूनागढ़ और 40 किलोमीटर दूर वेरावल भी जाया जा सकता है।

Guru's langar at Golden Temple, Amritsar
फूड: अमृतसर
शुरुआत गुरु के लंगर से
आम तौर पर अमृतसर में तीन तरह के सैलानी जाते हैं- काम-धंधे वाले, धार्मिक (स्वर्ण मंदिर के लिए) और इतिहास प्रेमी (वाघा बॉर्डर व जलियांवाला बाग के लिए)। लेकिन इसमें एक चौथी फेहरिस्त उन सैलानियों की भी जोड़ी जा सकती है जो अमृतसर स्वाद के लिए जाते हैं। पंजाब को हमारे उत्तर भारत के कई  जायकों का दाता माना जा सकता है। लेकिन जो बात अमृतसर के जायके में है, वो और कहीं नहीं। अमृतसर में खाने की बात हो तो वो गुरु के लंगर के बिना शुरू नहीं हो सकती। हर सैलानी के पहले कदम उसी ओर पड़ते हैं। स्वर्ण मंदिर के कड़ाह प्रसाद और लंगर को चखे बिना बात आगे नहीं बढ़ती। कतार लगाकर कड़ाह प्रसाद लेना, या सबके साथ पंगत में बैठकर लंगर चखना केवल स्वाद की बात नहीं है। उसका असली स्वाद तो उस माहौल व ऐतिहासिक परंपरा में है।
अमृतसर से मिले जो स्वाद बाकी देश ने भी सर-आंखों पर रख लिए उनमें सबसे पहला मक्की की रोटी और सरसों का साग है। लेकिन चूंकि यह सर्दियों का खाना है, इसलिए इसके लिए तब तक इंतजार करना होगा। लेकिन बाकी सालभर आप अमृतसरी कुल्छे व छोले जरूर खा सकते हैं। उसके बाद गिलास भरकर ठंडी लस्सी  आपको भोजन में तृप्ति का अहसास ला देती है। दरअसल मक्खन के साथ आलू के परांठे खाने और उन्हें लस्सी से हजम करने का स्वाद भी हमें अमृतसर से ही मिला है। फिरनी यहां का अलग जायका है और अक्सर शाम के खाने का अंत आप उससे करना चाहेंगे। जो लोग मांसाहारी हैं वे यहां के कीमा नान के साथ मिलने वाले तंदूरी चिकन का स्वाद याद रखेंगे। अमृतसरी नान और बटर चिकन भी उतना ही प्रसिद्ध है। हालांकि कई दुकानें हैं जो अपने स्वाद के लिए प्रसिद्ध हैं लेकिन ठेठ जायके के लिए स्वर्ण मंदिर के आसपास की दुकानों या ढाबों पर जाएं। बड़ी होटलों में वह बात नहीं बनेगी।
कैसे जाएं: अमृतसर अब अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है और दिल्ली से यहां के लिए सीधी उड़ानें हैं। नई दिल्ली से अमृतसर के लिए रोजाना स्वर्ण शताब्दी है। बाकी शहरों से भी अमृतसर के लिए कई ट्रेनें हैं। इन सबके अलावा जीटी रोड पर स्थित अमृतसर का सफर आप बस से या अपने वाहन से भी कर सकते हैं।

Glittering Macau
फैंटेसी: मकाऊ
एक चमकती-मचलती दुनिया
मकाऊ की दुनिया चकाचौंध करने वाली है। एक काल्पनिक सी। चीन के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित यह जगह एक देश- दो व्यवस्थाओं का नमूना है। चीन में ही हांगकांग इसका दूसरा उदाहरण है। विशेष क्षेत्र होने के कारण इसे सुविधाएं भरपूर मिलती हैं और बाकी देश के कानून भी इसपर लागू नहीं होते। जाहिर है, कि यह इसकी टूरिज्म इंडस्ट््री के शानदार तरीके से फलने-फूलने की बड़ी वजह है। हालांकि मकाऊ एक ऐतिहासिक शहर है और सैकड़ों सालों से चीन से जाने वाले सिल्क के लिए एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र रहा है, लेकिन आज का मकाऊ एक जगमगाता और चकाचौंध करने वाला शहर है। सब तरफ वैभव बिखरा पड़ा है। मकाऊ की प्रसिद्धि की एक वड़ी वजह वहां के कैसिनो और यहां की गैम्बलिंग की दुनिया है। इतनी ज्यादा कि यहां की गिनती अमेरिका में लास वेगास के बाद होने लगी है। यहां की रातों के नजारे अलग ही होते हैं। यहां दिन व रात में आसमान का रंग बेशक बदल जाए, माहौल की रंगीनियत चौबीसों घंटे एक सरीखी रहती है। यहां के वैभव ने एक से बढ़कर एक रिजॉर्ट व बाजार। खड़े कर लिए हैं। किसी समय पुर्तगाल का उपनिवेश होने की वजह से मकाऊ में चीन के साथ-साथ यूरोपीय शैली भी भरपूर झलकती है। वहीं मकाऊ टॉवर एडवेंचर का गढ़ है।
कैसे पहुंचे: मकाऊ का अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा ताइपा द्वीप पर है। यह द्वीप मकाऊ के फेरी टर्मिनल से 15 मिनट के सफर पर स्थित है। सैलानियों के लिए बड़ा आकर्षण होने की वजह से मकाऊ के लिए दुनिया भर से उड़ानें हैं।

Bungee jumping at Queenstown, New Zealand
एक्सट्रीम: क्वींसटाउन
दुनिया की रोमांच राजधानी
उस शहर जाने की कल्पना ही रोमांचक हो सकती है जिसे दुनिया की एडवेंचर कैपिटल के रूप में शोहरत हासिल हो। जिन्हें हम एक्सट्रीम एडवेंचर की संज्ञा देते हैं, वे सभी यहां हैं। हम बात कर रहे हैं न्यूजीलैंड के क्वींसटाउन शहर की।  कहा जाता है कि उन्नीसवीं सदी के मध्य में जब क्वींसटाउन में शॉटओवर नदी में सोना मिलने की खबर फैली तो लोग यहां उमड़ने शुरू हो गए थे। आखिरकार जब सोना खत्म हो गया तो यहां पहुंचे लोगों का ध्यान यहां के पहाड़ों और नदियों की खूबसूरती पर गया और तब उन्होंने यही बसने का फैसला कर लिया। रोमांच में यहां शुरुआत पिछली सदी के मध्य में स्कीइंग से हुई। 1970 के दौरान जेट बोटिंग की शुरुआत हुई। यह एक तरह से विशुद्ध रूप से रोमांच की दुनिया को क्वींसटाउन की देन थी। शॉटओवर नदी की गहरी कंदराओं में से जेटबोट की राइड का रोमांच ही अलग है। कुछ ही समय बाद रिवर राफ्टिंग भी क्वींसटाउन की नदियों में शुरू हो गई। 1988 में ऐ जे हैकट ने यहां बंजी जंपिंग की शुरुआत की। क्वींसटाउन को बंजी जंपिंग का जनक माना जाता है। आज यहां बंजी जंपिंग की कई साइट हैं। एक समय तो हैकट एंड कंपनी 450 मीटर की ऊंचाई से हेलीकॉप्टर से बंजी जंपिंग करा रहे थे। हालांकि सरकारी नीतियां बदलने से बाद में उसे रोकना पड़ा। क्वींसटाउन ही टेंडम पैरापेंटिंग व कमर्शियल स्काइडाइविंग का भी मुख्य अड्डा है। इसके अलावा यहां टेंडम हैंग ग्लाइडिंग, पैरासेलिंग व एब्सेलिंग जैसी गतिविधियां भी होती हैं। सैलानी क्वींसटाउन केवल एडवेंचर के लिए जाते हैं, जबकि वहां की प्राकृतिक खूबसूरती भी किसी जगह से कम नहीं।
कैसे जाएं: न्यूजीलैंड के दक्षिणी द्वीप के दक्षिण-पश्चिमी कोने में स्थित क्वींसटाउन में हालांकि इंटरनेशनल एयरपोर्ट है, लेकिन यहां की सारी अंतरराष्ट्रीय उड़ानें आस्ट्रेलिया के विभिन्न शहरों से होकर हैं।

Toy train at Darjeeling
किड्स: दार्जीलिंग
मस्ती भरी गुदगुदाती छुट्टियां
दार्जीलिंग वैसे भी देश के सबसे लोकप्रिय हिल स्टेशनों में से एक है, लेकिन परिवार के साथ खास तौर पर बच्चों को लेकर आनंद मनाने के लिए भी यह खासी मजेदार जगह है। यहां थोड़ी मस्ती भी हो जाएगी, थोड़ा घूमना भी, थोड़ा एडवेंचर और थोड़ा सीखना भी। दार्जीलिंग देश की उन गिनी-चुनी जगहों में से एक है जहां अब भी छोटी लाइन की रेलगाड़ी चलती है। इनके छोटे आकार के चलते ही उन्हें टॉय ट्रेन कहा जाने लगा है। दार्जीलिंग की टॉय ट्रेन बॉलीवुड की कई फिल्मों में रंग जमा चुकी है- आराधना से लेकर बर्फी तक। छोटी लाइन की गाड़ी बच्चों के साथ बड़ों के लिए भी बड़ी आकर्षक होती है। दार्जीलिंग के करीब पहुंचते-पहुंचते तो उससे दिखने वाला नजारा भी बेहद शानदार हो जाता है। घूम स्टेशन के बाद पटरी पर लूप बना हुआ है। वहां खूबसूरत बगीचा और सामने कंचनजंघा समेत हिमालय की बर्फीली चोटियां देखने के लिए बड़ी सी दूरबीन भी है। दार्जीलिंग में एक छोटा सा जू भी है। बच्चों को उसमें भी बहुत मजा आएगा। दार्जीलिंग की चाय तो बेहद मशहूर है ही। बच्चों को पास के किसी चाय बागान में ले जाकर चाय बनने की सारी प्रक्रिया की जानकारी दी जा सकती है। यह उनके लिए नई जानकारी देने वाला होगा। बच्चे रोमांच प्रेमी हों तो दार्जीलिंग के आसपास कई छोटे-छोटे व आसान ट्रैक भी हैं। उन्हें वहां भी ले जाया जा सकता है।
कैसे जाएं: दार्जीलिंग के लिए बड़ी लाइन का सबसे निकट का रेलवे स्टेशन दिल्ली-गुवाहाटी रेलमार्ग पर न्यू जलपाईगुड़ी है।  वहां से सिलीगुड़ी महज चार किलोमीटर दूर है। सिलीगुड़ी से ही दार्जीलिंग के लिए छोटी लाइन की ट्रेन या बसें-टैक्सी मिलेंगी। हवाई यात्रा के लिए बागडोगरा सबसे निकट का हवाई अड्डा है।  वहां से सड़क मार्ग से दार्जीलिंग जाना होगा।

Beautiful world deep in the sea
डाइविंग: लक्षद्वीप
समुद्र की गहराइयों में
लक्षद्वीप यानी एक लाख द्वीप। ऐतिहासिक रूप से इस नाम के पीछे जो भी वजहें रही हों, भारत के दक्षिण-पश्चिमी सिरे से लगभग  200 से 440 किलोमीटर की दूरी में स्थित इस द्वीप समूह में 39 छोटे-बड़े द्वीप हैं। ये द्वीप मालदीव के उत्तर की ओर अरब सागर में हैं। अमीनदीव, लक्कादीव और मिनिकॉय द्वीपों को भारत के कोरल द्वीप भी कहा जाता है। इनमें से ज्यादातर के तटों के पास समृद्ध कोरल रीफ हैं। खूबसूरत होने के बावजूद इन्हें ज्यादा सैलानी नहीं मिल पाए क्योंकि कुछ साल पहले तक यहां सैलानियों के लायक ढांचा व इंतजाम नहीं थे। लेकिन अब स्थिति बदल रही है।  सारे द्वीपों के आसपास लैगून व कोरल रीफ होने की वजह से ये वाटर स्पोट्र्स के लिए बेहद माफिक हैं। कोई हैरत नहीं कि आनेवाले समय में लक्षद्वीप का डंका वाटर स्पोट्र्स के लिए दुनियाभर के सैलानियों में बजने लगे। यहां कयाकिंग, कैनोइंग, याटिंग, स्नोर्कलिंग, विंड सर्फिंग, वाटर स्कीइंग और स्कूबा डाइविंग का आनंद लिया जा सकता है। कई ऑपरेटर वहां ये सब कराने लगे हैं। पानी के नीचे जाकर वहां के जलजीवन का नजारा लेना अपने आप में बेहद रोमांचक है।
कैसे पहुंचे: केरल में कोच्चि से लक्षद्वीप के लिए पानी के जहाज चलते हैं। इस सफर में 14 से 20 घंटे लग जाते हैं। इसके अलावा कोच्चि से लक्षद्वीप के अगाती हवाई अड्डे के लिए भी सप्ताह में छह दिन उड़ानें हैं। अगाती से कावरती व बंगाराम के लिए हेलीकॉप्टर सेवाएं हैं।

ग्लैमर: पेरिस
एन इवनिंग इन पेरिस
सीन नदी के किनारे बसा फैशन व ग्लैमर का यह शहर हममें से कई के लिए कल्पनाओं का शहर रहा है। पेरिस की जगमगाती शामों को सिनेमा के पर्दों पर देख-देखकर हममें से कई का मन लुभाया होगा। पेरिस का वह दबदबा आज भी कायम है। पेरिस को सबसे खूबसूरत व सबसे रोमांटिक शहरों में से एक होने की शोहरत हासिल है। संस्कृति, कला, फैशन, फूड व डिजाइन के क्षेत्र में पेरिस का असर समूची दुनिया पर है। पेरिस को सिटी ऑफ लाइट्स के साथ-साथ फैशन की राजधानी भी कहा जाता है। दुनिया के सबसे शानदार व भव्य डिजाइनर्स और कॉसमेटिक्स का भी गढ़ पेरिस ही है। लेकिन इस शहर का जुड़ाव इतिहास से भी उतना ही है। सीन नदी समेत शहर का काफी बड़ा हिस्सा यूनेस्को की विश्व विरासत की सूची में शामिल है। आखिरकार यहीं तो एफिल टॉवर भी है जो दुनिया में सबसे घूमे जाने वाली जगहों में से है। टोक्यो के बाद यहीं पर दुनिया में सबसे ज्यादा मिशेलिन रेस्तरां (रेस्तराओं की क्वालिटी का अंतरराष्ट्रीय पैमाना) हैं। पेरिस की लोकप्रियता इतनी ज्यादा है कि यहां हर साल साढ़े चार करोड़ सैलानी आते हैं। पेरिस को ग्लैमर की दुनिया में इसलिए भी काफी ऊपर आंका जाता है क्योंकि यहां कंसर्ट, थियेटर, सिनेमा, फैशन शो... हर वक्त कुछ न कुछ होता रहता है। यहां के थीम पार्क और गुदगुदाती शामें, आपको चमत्कृत करती रहेंगी। अलग-अलग संस्कृतियों को जगह देने के कारण भी पेरिस को बाकी शहरों की तुलना में ज्यादा पसंद किया जाता है।
कैसे पहुंचे: पेरिस में रोजाना कितने लोग उमड़ते हैं, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहां तीन अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे हैं। दुनियाभर से उड़ानें यहां पहुंचती है। भारत से भी वहां के लिए रोजाना कई उड़ानें हैं (वापसी किराया 35 हजार रुपये से शुरू)। पेरिस यूरोप के बाकी सभी बड़े शहरों से हाई स्पीड रेल नेटवर्क से भी जुड़ा है।

Badrinath
तीर्थ: चारधाम
जहां आस्था तकलीफ नहीं देखती
भारत में तीर्थ हर कोने में हैं। लोग पूरी श्रद्धा के साथ इन जगहों पर जाते भी हैं। भारत में पर्यटन में सबसे बड़ी हिस्सेदारी धार्मिक पर्यटन की ही है। यह भी बड़ी रोचक बात है कि भारत में ज्यादातर धार्मिक यात्राएं बेहद कष्टसाध्य हैं। लेकिन उससे भी लोगों का उत्साह कम नहीं होता। देश की सबसे प्रमुख तीर्थयात्राओं में चारधाम यात्रा भी एक है। वैसे तो देश के चार बड़े धाम चारों दिशाओं में हैं। लेकिन उत्तराखंड में बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री की यात्रा को भी प्रचलित अर्थों में चारधाम यात्रा ही माना जाता है। ये चारों स्थान हिमालय पर्वतमाला में ऐसे स्थानों पर हैं जहां साल के काफी समय बर्फ ही जमा रहती है। इसलिए यहां की यात्रा तभी संभव हो पाती है जब बर्फ कम होने पर रास्ते खुलते हैं। पारंपरिक रूप से बद्रीनाथ व केदारनाथ के पट खुलने के बाद यात्रा आरंभ होती है। यात्रा के ज्यादातर दिन उत्तर भारत में मानसूनी बारिश वाले होते हैं, इसलिए भी यह यात्रा तीर्थयात्रियों के लिए कष्टदायक हो जाती है। फिर भी लाखों लोग हर साल चारधाम यात्रा पर जाते हैं।
कैसे जाएं: चमोली जिले में स्थित बद्रीनाथ तक बसें व कारें जाती हैं। ऋषिकेश से बद्रीनाथ पहुंचने में पूरा दिन लग जाता है। द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक केदारनाथ के लिए गौरीकुंड से 14 किलोमीटर का पैदल मार्ग है। गंगोत्री ऋषिकेश से 265 किलोमीटर दूर है और वहां तक बसें व कारें जाती हैं। हां, आगे गोमुख के लिए पैदल जाना होगा। इसी तरह ऋषिकेश से 222 किलोमीटर दूर यमुनोत्री के लिए धरासू बैंड से रास्ता अलग फटता है। फूल चट्टी के बाद यमुनोत्री के लिए आठ किलोमीटर का ट्रैक है।

Sunday, March 31, 2013

जोधपुर में क्या खास


खान-पान
राजस्थान के शहर अपने स्वादिष्ट व्यंजनों का अलग आकर्षण रखते हैं। जोधपुर की कचौडिय़ां (विशेषकर प्याज की) खाना न भूलें। इसके अलावा मोतीचूर के मशहूर जोधपुरी लड्डू भी आपको कहीं और नहीं मिलेंगे। खाने के अलावा जोधपुर की बंधेज की साडिय़ां और लाख की चूडिय़ां बहुत मशहूर हैं।
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The Gateway, Jodhpur
कैसे व कहां
जोधपुर में राजसी शान से छुट्टियों बिताने के साथ-साथ कम खर्च में रुकने के कई अवसर हैं। रेलवे स्टेशन के पास और शहर में घंटाघर के पास कई सस्ते होटल हैं। वहीं ताज समूह के उम्मेद भवन जैसे हैरीटेज लग्जरी और विवांता व द गेटवे सरीखे शानदार होटल भी हैं। अब यह आपकी पसंद है कि आप शहर की हलचल के बीच रहना चाहते हैं या थोड़ा दूर शांत इलाके में।
जोधपुर हवाई अड्डा दिल्ली व मुंबई से रोजाना सीधी कई उड़ानों से जुड़ा है। इसके अलावा यहां से जयपुर, दिल्ली, व अहमदाबाद से सीधी ट्रेन भी हैं। जोधपुर की एक और खासियत यह है कि यह राजस्थान के पर्यटन सर्किट के मध्य में है। यहां से जयपुर, उदयपुर, जैसलमेर व बीकानेर लगभग तीन-तीन सौ किलोमीटर की बराबर दूरी पर हैं।
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Revolutions concert at The Gateway, Jodhpur
इवेंट्स का नया गढ़
जोधपुर बड़ी तेजी से आयोजनों के गढ़ के रूप में भी उभर रहा है। इसी महीने के शुरू में उम्मेद भवन में राजसी वस्तुओं की नीलामी में देश की जानी-मानी शख्सियतें जुटीं। उससे पिछले महीने 22 से 24 फरवरी को यहां वल्र्ड सूफी फेस्टिवल हुआ। पिछले दो सालों से जोधपुर में शरद ऋतु में राजस्थान इंटरनेशनल फोक (लोक गायन) फेस्टिवल हो रहा है। इसी कड़ी में पिछले दिनों जोधपुर में ताज समूह के द गेटवे होटल में रिवोल्यूशन सीरीज का पांचवा कंसर्ट हुआ। रिवोल्यूशन बैंड लीजेंडरी बीटल्स को समर्पित है।